एक दिन, दो सच्ची कहानी

आज दो काम पूरे हुए । शायद मार्च का महीना था, बोर्ड के एग्जाम चल रहे थे । चकराता में एक दुकान पर बैठ कर शाम की चाय पी रहा था । उसी दुकान में दो, तीन बच्चियां दिखाई दी । आदतन उनसे पूछ लिया कि क्या बोर्ड के एग्जाम देने आए हो ? उन्होंने कहा हां sir । मैंने बोला कि बहुत खुशी की बात है, बच्ची अलग अलग गांव से थी । मैंने उनसे आगे की पढ़ाई के बारे में पूछा, तो एक थोड़ा मायूस होकर बोली पता नहीं सर, मुझे लगा बच्ची पढ़ना तो चाहती है 10 के बाद भी लेकिन शायद घर की कोई समस्या होगी । मैंने फिर पूछा कि क्यों क्या हुआ ?? बच्ची बोली कि सर गांव में 10 तक का ही स्कूल है, इंटर कॉलेज या तो कालसी है या फिर 15 किलोमीटर दूर दूसरे गांव में । और घर वाले बाहर नहीं भेजेंगे । मुझे थोड़ा दुख सा भी हुआ । मैंने उसे बताया कि उस जैसी लड़कियों के लिए हमारे विभाग ने एक होस्टल कालसी में खोला हुआ है जहां पर लड़कियों को रहने खाने की सुविधा सरकार से फ्री दी जाती है और उनकी पढ़ाई नजदीक के  स्कूल में होती है । सुनकर बच्ची खुश हो गयी, मैंने उससे एक कागज और पेन लाने को कहा और वहां की वार्डन के लिए उसकी तरफ से एक एप्लीकेशन लिख कर उसको दे दी और बोला कि एग्जाम के तुरंत बाद वहां जाकर एप्लीकेशन जमा कर दे । लगभग मई के महीने में बच्ची का फ़ोन आया कि सर वो जो एप्लीकेशन आपने लिखी थी वो तो खो गयी, दोबारा से लिख कर भेज दीजिये, उसी दुकान से मेरे पिताजी जी ले लेंगे । मैंने फिर से एप्लीकेशन लिख कर दे दी । बच्ची का फ़ोन फिर आया जून में, अपना रिजल्ट बताया उसने बहुत खुश थी कि अच्छे नम्बरों से पास हो गयी थी । मैंने उसको फिर से उस एप्लीकेशन के बारे में याद दिलाया, वो बोली जी sir पापा जाएंगे । जुलाई महीने के शुरू में मैं उसी दुकान पर बैठ कर चाय पी रहा था, दुकान वालों ने बताया कि sir उस बच्ची को तो उसके घर वाले होस्टल भेजने को तैयार ही नहीं हैं, डर रहे हैं । मैंने बच्ची के घर फ़ोन किया, फ़ोन उसकी मम्मी ने उठाया और बताया कि बच्ची जिसका नाम सुनीता है, बकरी लेकर चराने गयी हुई है, मैंने उसकी माँ को बोला कि होस्टल का क्या हुआ ?? इसी बीच मेरे पास होस्टल वार्डन मैडम का भी फ़ोन आ गया था कि sir उस बच्ची का एडमिशन हो गया है उसको भेज दीजिये, मैं कुछ मायूसी से बोला कि मैडम लगता है बच्ची नहीं आ पाएगी, उसके घर वाले नहीं भेज रहे हैं । वार्डन मैडम बोली कि sir उनसे बात कीजिये, तभी सुनीता की माँ से बात की उनको बोला कि खुद जाकर होस्टल देख कर आओ, वहां रह रही बच्चियों से बात करके आओ ।
आज शाम 8 बजे एक नंबर से फ़ोन आया, सुनीता ही थी, बहुत ही खुश, बोली sir घर वाले मान गए हैं और मेरा एडमिशन हो गया है और मैं कल सुबह होस्टल जा रही हूं । मुझे बहुत ही खुशी हुई कि चलो एक बच्ची के जीवन मे कुछ नया हो सकेगा ।
दूसरी कहानी भी आज ही पूरी हुई ।  उसी दुकान पर शायद अप्रैल  के महीने में चाय पी रहा था । एक 8 या 10 साल की बच्ची मिली, मैंने यू ही पूछ लिया कि कौन सी क्लास में हो,बच्ची जिसका नाम गरिमा था, बोली 2 में, मैंने पूछा कि कहां, बोली sir प्राइमरी स्कूल दांगुथा में । यह स्कूल मेरे ही ब्लॉक का है, मुझे खुशी हुई और बच्ची से और बात की । इसी बीच उसकी माँ भी आ गयी जो उसी दुकान वालों के रिश्तेदार थे, और मिलने के लिए आये हुए थे । उसकी माता से बात हुई, पढ़ाई वगैरा के बारे में पूछा, माँ कुछ उदास सी हो गयी, बोली sir मेरी दोनों बेटियां आपके उसी स्कूल में है लेकिन यह थोड़ा बीमार है, पूछने पर उसने बताया कि बच्ची को दिल की कोई बीमारी है जिसका पता 1 साल पहले चेक अप के दौरान चला । उसने बताया कि बच्ची को देहरादून हॉस्पिटल में ले जाने को बोला गया है । उसका पति शराब इत्यादि पीता है और बच्ची के इलाज में कोई रुचि नहीं ले रहा है, चूंकि दो बेटियां हैं, और गरीबी भी तो मुझे लग ही गया था कि शायद इस बच्ची के इलाज के लिए वह प्रयास नहीं करेगा ।
मैंने वहां तैनात अपने टीचर्स से यह बात शेयर की तो उन्होंने भी बताया कि sir हम खुद इसको कई बार बोल चुके हैं कि सारा इलाज फ्री होना है बस बच्ची को देहरादून ले जाना है ।। बात आई गयी हो गयी । 06 जुलाई शुक्रवार को मैं उसी दुकान पर चाय के लिए पहुंचा, वहां वही महिला उसी बच्ची के साथ और अपने छोटे बच्चे के साथ मिली । उसने बताया कि वह खुद हिम्मत करके बच्ची के इलाज के लिए देहरादून जाएगी, मुझे लगा कि यह अकेली कुछ नहीं कर पायेगी । मैंने उसके रिश्तेदार से पूछा जो उसका जीजा था, उसने बताया कि sir हमने इसको बुला तो।लिया है पर इसके पति को तो आना चाहिए था, इतने दिन में भी अपना काम नहीं छोड़ सकता दुकानदार आदमी हूँ ।  साथ ही उसने बताया कि यदि इसका पति नही आया तो हम इसको वापस गांव भेज देंगे जो कि चकराता से 120 किलोमीटर दूर था जहां से वह हिम्मत करके अकेले ही दो छोटे बच्चों के साथ आ गयी थी । मैंने सोचा कि कुछ भी हो, इसको अब देहरादून भेजना ही है, यह अब वापस गांव नहीं जाएगी । मैंने डॉक्टर साहब को फ़ोन किया जिन्होंने उसको देहरादून के लिए रेफर किया था, संयोगवश वह देहरादून में ही किसी अन्य duty में लगे थे, मेरे अनुरोध पर वह बच्ची को बस स्टॉप से हॉस्पिटल तक ले जाने के लाइट तो तैयार हो गए किन्तु बाद में और भी चेक अप और अलग अलग हॉस्पिटल ने जाने की समस्या और फिर परिवार के रुकने की भी व्यवस्था करनी थी । उस बच्ची का पिता गांव से आए के लिए तैयार ही नहीं था ।  मैंने अपने टीचर्स ग्रुप में मैसेज किया कि मुझे 01 लेडी और एक जेंट्स टीचर की जरूरत है जो इस लेडी के साथ हॉस्पिटल जा सके । पैसे का बंदोबस्त मैं कर दूंगा, मेरा प्रयास देख कर, उसके जीजा का दिल थोड़ा पसीज गया और वह बोला कि sir देहरादून तक तो मैं इसको ले जाऊंगा, लेकिन आगे का आप कुछ करिए ।
इसी बीच मुझे दो ऐसे टीचर मिल गए, एक श्री सुरेंद्र आर्यन जी ने तो मुझे आश्वस्त कर दिया कि sir आप चिंता न करें मैं बच्ची के इलाज की पूरी जिम्मेदारी लेता हूँ और इलाज के दौरान यह परिवार मेरे खुद के घर रहेगा । मुझे बहुत ही खुशी हुई । खैर बच्ची और उसकी माता को हमने सोमवार को देहरादून के लिए रवाना कर दिया, औरत का जीजा शाम को ही वापस आ गया था, इसी बीच मुझे बच्ची का अपडेट मिलता रहा, सोमवार को उसकी सारी कागजी कार्यवाही हो गयी थी तथा मंगलवार को उसको आपरेशन के लिए एडमिट कर लिया गया और आज ही दोपहर को उसका आपरेशन भी सफलता पूर्वक हो गया ।
इस कार्य मे सभी का सहयोग रहा,बच्ची की माँ की हिम्मत, जीजा का सहयोग और सबके बड़ी मदद हमारे दोनों टीचर्स की ।अच्छा लगता है ऐसा कुछ करके । लगता है कि इस जॉब में आने का मकसद पूरा हो जाता है । अब एक नया दिन और एक नए ऐसे ही किसी काम की तलाश में लग जाऊंगा ।

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