तैयारी वाले लोग
इधर देखा गया है कि समाज के सभी तबकों के विषय मे कुछ न कुछ लिखा गया है, लिखा भी जाता है, अमीर के बारे में, गरीबों के बारे में, आम आदमी के बारे में, खास आदमियों के बारे वाली ख़बरों से तो खैर सारे अखबार और विभिन्न पत्रिकाएं व आजकल के चौबीसों घंटे ताजा खबर परोसने वाले चैनल भरे रहते हैं । कवियों के बारे में, लेखकों के बारे में भी पुस्तकें, आत्मकथा, जीवनी इत्यादि मिल ही जाएंगी । किन्तु मेरी नजर समाज के उस बहुत ही खास छोटे से तबके पर गयी है । जो युवा है ( इसका अर्थ उम्र से कदापि न लगा लिया जाय ) क्योंकि इधर जबसे सरकारी नौकरियों के मिलने की उम्र 47 वर्ष तक की जा चुकी है तो तकनीकी रूप से उस उम्र तक का हर बेरोजगार व्यक्ति युवा ही माना जायेगा ।
तो पाठकों अब तक शायद आपको अनुमान हो ही गया होगा कि मैं किस तबके की बात कर रहा हूं । वैसे हमारे गांव, देहात में तैयारी दो ही चीजों की मन लगा कर की जाती है, एक तो शादी विवाह की और दूसरी 10 वीं और 12 वीं की बोर्ड परीक्षाओं में पास होने की । जी हां लेकिन इन दोनों महत्वपुरन तैयारियों से भी इतर एक और तैयारी है, जिससे मेरा साबका वर्ष 2005 में फौज की नौकरी छोड़ने के बाद हुआ । तो मित्रों यह तैयारी है, सिविल सेवा परीक्षाओं की । IAS और PCS की । जी हां हमारे वर्तमान की हिंदी पट्टी का एक बहुत बड़ा युवा वर्ग इस श्रेणी में रखा जा सकता है । जिसके मैंने नाम दिया तैयारी वाले लोग । में इनको मात्र विद्यार्थी, या युवा भी बोल सकता था, किन्तु मेरे अनुभव के आधार पर मुझे इनके अंदर कुछ अत्यंत ही विलक्षण लक्षण दृष्टिगोचर हुए इसलिए मैंने इनके लिए इसी शब्द का प्रयोग करना उचित समझा है । तैयारी वाले इन लोगों से मेरा परिचय यू तो B.Ed. के ही दिनों में हो गया था, में फौज से नया नया आया ही था कि मेरा B.Ed. के लिए रुड़की के ही DAV college में चयन हो गया था । यहां मेरे इस बैच में बहुत से प्रतिभा शाली साथी मिले । जो अक्सर खाली पीरियड में ज्ञान भरी बातें किया करते थे । उनकी बातें सुन कर मुझे बार बार अपने अज्ञानी होने का भान होता रहा करता था । इधर मैं 12 कक्षा पास करने के बाद ही फौज में जवान के तौर पर भर्ती हो गया था जो कि हमारे समय (1990) मे बहुत ही विलक्षण समझा जाता था । गांव के किसी भी लड़के की उन दिनों यदि 10वीं या 12 वीं पास करने के बाद पुलिस में सिपाही की या फौज में जवान की नौकरी लग जाया करती तो तो उस युवा को बड़े ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था । और इससे भी अधिक सम्मानित बात होती थी कि यदि कोई पटवारी बन जाया करता था, या रोडवेज में कंडक्टर या ड्राइवर इत्यादि बन जाता था तो और भी अधिक सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था । और सबसे अधिक प्रतिष्ठित नौकरी तो हमारे इलाके में आज भी BHEL की ही समझी जाती है । मैंने तो।लोगों को कहते भी सुना है कि शायद यह उनके पूर्व जन्मों का ही कोई प्रतिफल है कि उनके लड़के की ITI पास करते ही थोड़ा बहुत देकर BHEL में नौकरी लग गयी है । खैर मुझे तो इन सभी बड़ी नौकरियों में जाने का सौभाग्य प्राप्त नही हुआ क्योंकि मैं तो 17 साल की उम्र पूरी करते ही भारतीय नौसेना में नौसैनिक बन चुका था ।
खैर मैं वापस आता हूं अपने इस लेख के नायकों पर, तैयारी वाले लोगों पर । मैंने इनको यह नाम देना इसलिए उचित समझा कि हम जैसे नवोदित तैयारी वाले लोग जहां प्रतियोगिता दर्पण तथा आजकल चल रही लुसेंट सामान्य ज्ञान को ही पढ़ कर अपने पांडित्य ज्ञान पर आत्ममुग्ध हो जाते हैं किंतु इन लोगों के लिए इस प्रकार की पुस्तकें ककहरा सिखाने वाली मात्र होती हैं । इनकी पुस्तकें अमूमन बाजार की किसी भी दुकान पर उपलब्ध न होने वाली होती है, जिसको कि बड़े ही जतन से किसी और अपने से सीनियर तैयारी वाले आदमी की सलाह के बाद दिल्ली या इलाहाबाद के किसी पब्लिशर से विशेष तौर पर मंगवाया जाता है । और उसको फिर इतना छुपा छुपा कर पढ़ा जाता है कि बाजू वाले को पता भी नही चलता कि आखिर बंदा पढ़ क्या रहा है । ये हुई इनकी तैयारी वाली पुस्तकों की बात । कुछ परीक्षाओं के दौरान मुझे इनके साक्षात दर्शन करने का भी परम सौभाग्य प्राप्त हुआ है । परीक्षाओं में ये तैयारी वाले लोग परीक्षा स्थल पर एक दिन पहले ही पहुंच जाते हैं, ताकि किसी भी प्रकार का चांस न लिया जा सके । परीक्षा वाले दिन ये अत्यंत धीर गंभीर मुद्रा में अपना रोल नंबर देख कर अपने कमरे में अपनी सीट पर बड़ी ही शांत मुद्रा में बैठ जाते हैं । वहीं हम जैसे लोग परीक्षा के ही दिन केंद्र पर पहुंचते हैं और अपने साथ साथ और भी रोल नंबर देख लिया करते हैं, और साथ ही हमसे भी देर से आने वालो के गाइड भी बन जाते हैं कि भाई इधर जाओ, उधर जाओ, और यदि देर से आने वाली कोई मोहतरमा हुई तो सादर उनको उनके कमरे ही नही, सीट तक भी पहुंचा कर आने में अपना परम सौभाग्य मानते हैं । इधर हम दाखिल होते हैं अपने परीक्षा कक्ष की और रास्ते मे पड़ने वाले सभी कमरों के अंदर बैठे लोगों का जायजा लेते हुए कि क्या पता कोई पुराना दोस्त मिल ही जाए । इधर जब तक कक्ष में कॉपी वितरित हो चुकी होती है और हम जैसे लोग आते हैं, और फिर पता चलता है कि या तो प्रवेश पत्र भूल गए या फिर पेन ही । खैर परीक्षा प्रारंभ होती है, तैयारी वाले लोग जुट जाते हैं कापियों पर कापियों को भरने में, एक योद्धा की भांति, इधर हम जैसे लोग यही सोच कर कुंठित हो जाते हैं कि यहां एक ही कॉपी को भरने में इतनी मेहनत मशक्कत करनी पड़ रही है, और इन लोगों ने अतिरिक्त कापियों की ही लाइन लगा दी है । पेपर छूटने के बाद हम जैसे लोग, और कुछ हुमी जैसों के साथ अपना पेपर डिसकस करते हैं, किन्तु तैयारी वाले लोग नदारद हो जाते हैं । इधर हम जैसे लोग निकल पड़ते हैं चाय पीने और दोस्तों को ढूंढने, ये लोग पाए जाते हैं मैदान के बिल्कुल अंतिम छोर पर, सभी की और पीठ फेर कर बैठे हुए अपने दूसरी पाली वाले एग्जाम की अंतिम क्षण की तैयारी में । पीठ इसलिए घुमा ली जाती है कि गलती से भी कोई जान पहचान का कोई मित्र हाल चाल पूछने भी न आ जाये और इनका टाइम खराब कर दे । वहीं हम जैसे लोग चाय पीकर मैदान का भी एकाध चक्कर और दोस्तों की तलाश करने में लगा ही दिया करते थे । खैर अगली पाली भी समाप्त और ये लोग फौरन परीक्षा स्थल से गायब । तैयारी वाले लोगों को विभिन्न परीक्षा देने का इतना अधिक अनुभव हो चुका होता है कि हम जैसे अल्प बुद्धि के लोगों के किसी प्रश्न के गलत होने की शंका समाधान परीक्षक से करने पर इनको अपना बहुमूल्य समय बर्बाद तथा डिस्टर्ब करना समझा जाता है । मेरे ही साथ ऐसा मजेदार वाक्य हुआ जब मैं उत्तराखंड PCS की मुख्य परीक्षा का हिंदी का पेपर दे रहा था तो प्रश्नपत्र में एक प्रश्न पूछा गया था कि, किसी सरकारी कार्यालय में सुपर कंप्यूटर के उपयोग पर एक निबंध या लेख लिखो ?? ऐसा ही कुछ था । अब मेरे जैसे अल्प बुद्धि के प्राणी को शंका हुई कि क्या हमारे सरकारी कार्यालयों में भी सुपर कंप्यूटर का उपयोग होता है ?? मैंने कक्ष में तैनात परीक्षक महोदय से प्रश्न के मिस प्रिंट होने की बात बोल कर शंका कर दी कि सर क्या मैं अपना उत्तर इस सुपर को भूल कर लिख सकता हूँ ?? जवाब में मुझे कक्ष में मौजूद सभी परीक्षाथियों ने इस प्रकार देखा कि मानो मैंने कोई अनोखी बात बोल दी हो । परीक्षक महोदय ने भी मेरा शंका समाधान नही किया, उन्होंने बुलाया आयोग के किसी कार्मिक को, वह सज्जन वही कदाचित तैयारी वाले ही थे, उन्होंने बोला कि आपको जो समझ मे आ रहा है, लिख दीजिये, लेकिन मैंने अपनी बात फिर से रखनी चाही तो मेरे से पीछे बैठे एक सज्जन ने मुझे लगभग डांटते हुए बोला कि बैठ जाइए, क्यो हमको डिस्टर्ब कर रहे हैं ?? मुझे बुरा तो लगा पर शंका समाधान न होता देख चुपचाप कुछ भी लिखना उचित ही समझा । मुझे बाद में यह ज्ञान हुआ कि मेरे कमरे में मेरे अलावा सभी तैयारी वाले ही लोग थे, जिनको मालूम था कि यदि प्रश्न पत्र में कोई प्रश्न गलत छापा हुआ आ जाता है तो कुछ भी लिख देना चाहिए उस पर सभी को समान अंक दे दिए जाते हैं । बाद में मुझे पता चला कि मुझे डांटने वाले सज्जन बहुत पहले ही PCS परीक्षा पास कर चुके थे तथा पिछले 2 या 3 बार से पुनः सिर्फ SDM ya Dy SP में चयनित होने के लिए परीक्षा दे रहे थे । मेरे से आगे डिग्री कॉलेज के एक लेक्चरर महोदय एग्जाम दे रहे थे । वह भी तैयारी वाले थे और इसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु बार बार परीक्षा दे रहे थे । मुझे तो बहुत बाद में पता चला कि तैयारी वाले लोगों को मुख्य परीक्षा में क्या क्या कॉम्बिनेशन रखना चाहिए जिससे कि scalling (वर्तमान में नही है ) में कोई नुकसान न हो । इधर हम जैसे अनाड़ी लोग मुख्य परीक्षा की तिथि से कुछ ही दिन पहले अपना कॉम्बिनेशन सेट कर पाए । शिक्षा शास्त्र, मैनेजमेंट, सोशल वर्क, अंग्रेजी साहित्य जैसे विषयों की किताबें पढ़ चुकने के बाद मेरी खोज इतिहास और राजनीति शास्त्र पर ही जाकर रुकी वह भी तब, जब मुख्य परीक्षा का शायद 01 ही माह बचा था । ये विषय भी इसलिए ले लिए गए थे एक तो दोनों में MA किया हुआ था दूसरा उन दिनों आर्मी स्कूल में सामाजिक विज्ञान विषय का अध्यापक भी रह चुका था । मुझे तो कई विषयों के नाम भी तैयारी वाले ही लोगों से मालूम पड़े । खैर कुछ भी हो, इन तैयारी वाले लोगों के जज्बे को मैं सलाम करता हु, जब इनकी जीवन गाथा सुनता हूं कि कोई 10 साल से 5 साल से तैयारी कर रहा है, कोई इतनी बार IAS ya PCS का इंटरव्यू दे चुका है, किन्तु निराश हुए बिना, तथा दी हुई परीक्षा के परिणाम का इंतज़ार किये बिना ही दूसरे एग्जाम की तैयारी में फिर उसी तन्मयता से लग जाना वाकई कोई साधारण बात नही है । मुझे शायद एक भूत पूर्वे सैनिक होने के कारण पहले ही प्रयास में सफलता मिल गयी थी, और फिर मैंने दूसरे प्रयास के बारे में कभी नही सोचा, क्योंकि फिर से वही सब किताबें, वही तैयारी, कोई नयापन नही, तैयारी के दिनों में कुछ और न पढ़ पाने की विवशता ने मुझे दूसरा प्रयास लेने से रोके रखा । किन्तु सलाम इन तैयारी वाले लोगों के जज्बे को जो फिर से बैठे और और भी उच्च पद पर चयनित हुए ।
You are great sir
ReplyDeleteInspiring...
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