उत्तराखंड में वर्ष 2019 के पंचायत चुनावों का अनुभव

उत्तराखंड के पंचायत चुनावों में इस बार सहायक निर्वाचन अधिकारी ARO की जिम्मेदारी दी गयी । मेरे कार्यस्थल चकराता ब्लॉक में कुल 116 ग्राम पंचायत हैं जिनको कुल 11 न्याय पंचायतों में बांटा गया है । प्रत्येक न्याय पंचायत की जिम्मेदारी एक एक ARO को दी गयी । हमारा कार्य दिनांक 18 सितंबर 19 को हुए पहले प्रशिक्षण केउपरांत ही प्रारंभ हो गया था । जिसमे सर्व प्रथम पंचायतों के तीनों स्तरों के कुल चारों पदों के नामांकन पत्रों की बिक्री दिनांक 22 सितंबर तक की गयी । दिनांक 23 से 25 सितंबर तक भरे हुए नामांकन पत्र प्राप्त किये गए तथा दिनांक 26 से 28 सितंबर तक इनकी जांच का कार्य करने के बाद व नाम वापसी के बाद चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को चुनाव चिन्ह दिनांक 06 अक्टूबर 19 को आवंटित किए गए । पंचायत चुनाव में डयूटी का यह मेरा पहला अनुभव था इससे पहले वर्ष 2009 के लोक सभा चुनाव में मतदान अधिकारी, वर्ष 2014 के विधान सभा चुनाव में पीठासीन अधिकारी व अभी 2019 के लोक सभा चुनावों में सेक्टर मेजिस्ट्रेट की ड्यूटी का ही अनुभव था।

पंचायत चुनाव निम्नलिखित पदों हेतु आयोजित किये जाते हैं

1. सदस्य ग्राम पंचायत यानी
Ward member

2. ग्राम प्रधान

3. सदस्य क्षेत्र पंचायत यानी
BDC मेंबर

4. सदस्य जिला पंचायत ।

उपरोक्त पदों व इन पर खड़े होने वाले प्रत्याशियों की अधिक संख्या के कारण ही शायद ये चुनाव मतपत्रों से कराए जाते हैं । जिनमे EVM का उपयोग नहीं किया जाता ।

अतः सबसे अधिक जिम्मेदारी का यही कार्य होता है कि प्रत्येक ग्राम पंचायत के प्रत्येक बूथ पर सही मात्रा में सभी पदों के मतपत्र भेजे जाएं । आम लोगों को बड़ी ही आसान सी दिखाई देने वाली यह चुनाव प्रक्रिया बड़ी ही जटिल व लंबे समय तक चलने वाली होती है जिसमे लगभग 30 से 35 दिनों का समय लग जाता है। । 21 अक्टूबर को मतगणना हो जाने के बाद ही हम इस डयूटी से कार्यमुक्त होंगे ।

फेस बुक पर इतनी लंबी पोस्ट को लिखने का उद्देश्य है हमारी युवा पीढ़ी को इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी प्रदान करना जिससे मेरी तरह शायद ये सब भी अनभिज्ञ होते हैं । विद्यार्थी जीवन मे तो मुझे कभी वोट देने का अवसर ही प्राप्त नहीं हुआ था क्योंकि 17 वर्ष 3 माह की ही आयु में नौसेना में भर्ती हो गया था तथा वर्ष 2005 तक शायद कभी किसी भी प्रकार के चुनाव में अपने मताधिकार का नहीं कर पाया । मेरे द्वारा शायद सबसे पहला वोट वर्ष 2014 के लोक सभा चुनावों में ही डाला गया था तथा इसके बाद गांव में अभी हाल ही में हुए पंचायत चुनावों में भी वोट डाला था । अपने गांव के पंचायत चुनावों में खुद ही इतने सारे अलग अलग तरह व चुनाव चिन्ह वाले मतपत्र देख कर चकरा गया था कि आखिर ये इतने मतपत्र होते किस लिए हैं । खैर अब इस प्रक्रिया को अच्छे से समझ लिया है अतः यह एक अच्छा अनुभव भी रहा ।

इस बार के पंचायत चुनावों में एक बात देखने को मिली कि बहुत बड़ी संख्या में युवा प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं तथा यही युवा वर्ष चुन कर भी आएगा । यह संभव हो पाया चुनाव लड़ने हेतु 02 बच्चों की शर्त व कम से कम कक्षा  10 पास व आरक्षित वर्ग हेतु कक्षा 8 पास होना इस बार अनिवार्य बनाया गया था । मेरी ही न्याय पंचायत में एक मात्र 21 वर्ष आयु की कक्षा 12 पास बालिका निर्विरोध प्रधान चुन ली गयी है जो कि नेपाली मूल के गोरखा समुदाय से आती है । चुनाव में चूंकि प्रत्याशी हेतु न्यूनतम आयु 21 वर्ष रखी गयी है अतः बहुत से ऐसे प्रत्याशी भी। मैदान में थे जो मात्र कुछ ही दिनों पहले 21 वर्ष के हुए ।

पहाड़ों में आज भी बालिका शिक्षा की हालत कोई ज्यादा अच्छी नहीं है, चकराता ब्लॉक में ही बहुत से ऐसे वार्ड भी मिले जहां SC वर्ग हेतु आरक्षित सीट के लिए कोई कक्षा 8 पास बालिका या स्त्री नहीं मिल पाई । शायद अब इस चुनाव के बाद लोग स्त्री शिक्षा पर और भी अधिक ध्यान देंगे । किन्तु मेरे विचार से इस शैक्षिक योग्यता को कम से कम स्नातक तो सभी वर्गों हेतु किया ही जाना चाहिए जिससे कि पढ़े लिखे लोग इस क्षेत्र में आएं ।

चुनाव लड़ने हेतु रखी गयी न्यूनतम आयु 21 वर्ष रखी गयी है जिस पर भी पुनर्विचार किये जाने की आवश्यकता है । एक तो यह कि यदि 21 से 25 वर्ष की बीच की आयु में कोई प्रत्याशी अविवाहित के रूप में चुनाव जीत लेता है तो वह चुनावों के बाद विवाह करके 2 से अधिक बच्चे अपने परिवार में पैदा कर सकता है भले ही फिर एक बार चुनाव जीतने के बाद अगली बार चुनाव हेतु अयोग्य ही न हो जाय किन्तु 02 बच्चों यानी सीमित परिवार की अवधारणा इस प्रक्रिया में कहीं पीछे छूट सी जाती है । अतः यदि चुनाव ही लड़ने की आयु 25 या 30 वर्ष कर दी जाय तो इससे यह लाभ हो सकता है कि उस उम्र तक विवाह भी हो चुका होगा तथा चुनाव लड़ने का इच्छुक प्रत्याशी अपने परिवार को भी सीमित जरूर रखने का प्रयास करेगा । दूसरा, चूंकि 21  वर्ष के युवा को अभी जीवन का  वह अनुभव भी प्राप्त नहीं हो पाता फलतः वह अपने चयनित होने के उपरांत भी अपने घर के बड़ों या अन्य वरिष्ठ सदस्यों पर निर्भर हो जाएगा । 25 या 30 वर्ष की आयु तक युवा अपना अध्ययन भी पूर्ण कर चुका होता है तथा थोड़ा बहुत अनुभव भी प्राप्त कर ही लेता है ।

शैक्षिक योग्यता भी मेरे विचार से सभी वर्गों अनारक्षित व आरक्षित वर्गों हेतु समान ही रखी जानी चाहिए इससे आरक्षित वर्ग से जीत कर आने वाले प्रत्याशी में भी एक आत्मविश्वास होगा कि वह भी उतना ही सक्षम व शिक्षित है । चूंकि कार्य की प्रवर्त्ति भी समान है अतः समान पद व कार्य हेतु सभी हेतु समान शैक्षिक योग्यता रखे जाने पर विचार किया जा सकता है । इससे आरक्षित वर्ग के शैक्षिक स्तर को भी ऊपर लाये जाने में अवश्य ही मदद मिलेगी ।

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